दैनंदिन नियति और प्रसंगों का विचार-पुरुष : श्रीनिवास श्रीकांत

 

 

 

कविता की उन उद्भाषित परिभाषाओं से परे की बात करती श्रीनिवास श्रीकांत की कविताएँ हम जैसे उज्जड़ पाठकों के लिए अनमोल रत्न हो सकती हैं। लगभग चार दशक बाद हिमाचल के हिन्दी के वरिष्ठ कवि व आलोचक श्रीनिवास का  ‘बात करती है हवा’ नामक कविता संग्रह प्रकाश में आया है। इस संग्रह की अधिकतर कविताएँ सामाजिक संवेदना से आप्लावित हैं। कवि ने जीवन के उस निम्नतम और श्रेष्ठतम को प्रकट करने का समर्थ प्रयास किया है, जिनसे हम रोज़, हर वक़्त जूझते रहते हैं। बेशक यह आलोचना सूरज को दीया दिखाने जैसा ही है।

कविता क्या है? क्यों है? इस संबंध में उनकी सोच बहुत सूक्ष्म और संवेदित है। जो अनायास हमारा ध्यान आकृष्ट करती है।
वायवीय है कविता
एक पिघलती हुई
नदी
धमनियों से रिसता
रक्त
शरीर से फूटता
एक नया
शरीर
कविता में कविता की सोच। यहाँ बात हो रही है उन प्रतिमानों की, जिनसे एक नवोदित या दक्ष कवि निरन्तर साक्षात्कार करता है। कवि के अनुसार कविता किसीमें सहज-स्व अनुभूति से उपजती है तो कोई किसी प्रेरणावश कविता करने बैठ जाता है। और तब,
कवि पैदा करता है
नए अर्थ
मगर अपने कायान्तर में भी
वह
होती है वही।
कविता करना कोई शब्दों का खेल नहीं है, कोई कागज पोतना नहीं है। कविता अपने आप में एक जीवन है जिसमें कवि अपनी जीवन यात्रा का समूचा या अंशरूप जीता है। कविता के प्रति श्रीनिवास का सरोकार शाश्वत आत्मा-सा है। उनकी कविता का यथार्थ मानवीय जीवन का वह तंत्र-परोक्ष यथार्थ है, जिस तक सामान्य कवि नहीं पहुंच सकता। वह जहाँ कह रहे हैं तो कोई छल नहीं कर रहे हैं,
सच सच देखना
नहीं है इतना आसान
जमीन की पकड़ से
छूट जाता है हर बार
आदमी के अन्दर कीखाइयों में
दुबका सच
कविता और कवि का चिरकालिक संबंध उनकी दृष्टि में उदात्त रहा है। अपने विचारों की तीखी सान से समाज के विकृत चेहरे को बदलने के विकल्प बुनती उनकी कविता आज भी सृजनशील है।
कितनी रातों से सोई नहीं
वह होती रही है परेशान
अपनेपन की आधी-सच यादों में
आधा-आधा जिया है उसनेअपने से बाहर
यह परेशानी कविता की आंतरिक नहीं है, उस कविता में जी रहे पात्रों की पहचान के परोक्ष में कवि की है। यही किसी सार्थक कवि का वास्तव भी होता है।
पर क्यों आखिर क्यों
नहीं करती कविता
इन साजिशों का पर्दाफाश
इसलिए कि लेखक लिखते लिखते
हो गए हैं कमज़ोर?
कवि चिंतित है, आजकल केरटे-रटाए, उधारी के शब्दों, भावों से खेलने वाले कवियों-लेखकों से। वह तीखे व्यंग्य में आगामी समय के कवियों को जिंदगी-दर-जिंदगी होती मौत की ओर आगाह करते हैं कि यह भूख मिटे, दूर हों सुखों की जी-हजूरियाँ, जीने के लिए यह चीख-ओ-पुकार मचाना अब तो बंद होनी चाहिए, इसलिए लेखक लिखेंसमाज के हेतु पूंजीवादी दैत्य के विपक्ष में। कवि का संबोधन निहायत स्वाभाविक है,
रपटीले कवियों
इतिहास का दम्भकार
जब हो रहा अपने दायित्वों से फरार
तुम उसे पकड़ो
शब्दों से यातना दो
श्रीनिवास की कविताओं में भूकवियों जैसा छिछलापन नहीं, बनावटीपन नहीं, दिखावटी संवेदना नहीं है। वह समाज के उस अतिदलित मनुष्य की तंगियों से परेशान होता है। समाज और उसके अद्‍​र्धविक्षिप्त मानवीय संबंधों से इंतहा परेशान कवि कभी पंछी की उड़ान भरता है, कभी अपने मुग्ध प्रेमी से उदासी बाँचता है, कभी सपनों की घाटियों में यादों की अंधेरी हवेलियों में खोजता है जीवन के रास्ते, कुछ बिम्बित क्षण, दुखों के, स्थितियों के,

एकान्त घर में 
अकेली
एक औरत
कर रही 
कपड़े इस्त्री
आकाश के पेट में 
धंसता जा रहा सूरज।

आदमी और प्रकृति के पारस्परिक संबंधों के पुरावशेषी कालखण्ड को थपकी देता, एक अंतहीन बहस को जमीनी हकीकत से जोड़ता कवि एक अबूझी-सी यायावरी दास्तान गुनगुनाता है,

कहाँ रही अब
वे धर्मभीरू बुढि़याएँ
जो खिलाती थीं चुग्गा-चूरी
पिलातीं थी कटोरे में पानी
माया को मानतीं
जीवों का संसार?
दैनंदिन सामाजिक जीवन से धीरे-धीरे लुप्त होते संवेदना बीज, भाप होती सहजता, ठूंठ होते रिश्ते कवि के लिए नितांत चिंता का विषय हैं,
गांव कहां रहे
अब ग्राममय
××××××××××
कटता रहा समय
और समय के साथ-साथ
कटते गए एक-दूसरे से
गांव के लोग
कि कवि कहीं भी आज के देश-समाज की ऐसी दुर्दशा का आकांक्षी नहीं था। वह हैरान है, चंद सालों में समाज क्या से क्या हो गया, वह पीडि़त है,
समय ने चीर दिया बीच से
ढलवां जमीन को
और बना दी एक सड़क
देखते रह गए
झूमती टहनियों के गुच्छे
और घास के
नन्हें-नन्हें फूल
आज केगाँवों की बदलती छवियों के प्रति चिंतित बुद्धिजीवी कवि सोचने को मजबूर है जिस तरह शहर की इमारतों की प्रतिछायाएँ अब गाँवों में भी घिरने लगी हैं, वह किसी भी व्यक्ति को प्रश्नाकुल करने के लिए पर्याप्त है।
अब नहीं रहीं
वे कोठरियाँ जिनमें
खनखनाते थे
पूजा के बासन
और न वे रसोइयाँ
जिनमें टनकती थीं
बाबाकी खरीदी पतीलियों में
दादी की कड़छियाँ
राजनीति के घुप अंधेरे में भी जीवन को सार्थक रूप प्रदान करने में श्रीनिवास की कविताओं का सानी नहीं।
भीड़ की आतुर आँखों में
उजाला कैसे आए?
भीड़ तो आखिर भीड़ है
श्रीनिवास अपने आरोह-अवरोह की पूरी गमक और स्वरों के बीच की गहरी खामोशियों के साथहर जगह मौजूद हैं।
बात करती है हवा
खला में गूंजता उसका स्वर
जिसे सुन रहा
घाटी का बुजुर्ग पेड़
अप्रत्यक्ष रूप से मानवीय जीवन की उदासीनता, संघर्ष, भय, प्रपंच व निस्सहायता कविता का लक्ष्य है। कवि के अंतस पर मुख्यत: मुक्तिबोधीय आस्था का प्रभाव रहा है। इससे स्पष्ट है कि वे कविता को मानव के चक्रव्यूहीय मानस को द्वंद्वों में ले जाने में सक्षम हैं।
विचार पुरुष खोजता है
अपने समय के खोए हुए सिक्के
जिन को बीन कर ले गई होंगी
दुखों की मेहतरानियाँ
कि विचार पुरुष अब भी अकेला ही है। उसे कोई साथ चाहिए। अपना उत्तराधिकारी चाहिए। लेकिन समय बदल गया है। जीने का चलन टेढ़ा गया है। कवि इंतजार तो कर ही सकता है। उसे आशा तो है ही। सामाजिक मौसम और आदमी से निराश उनका कविमन आग्रहपूर्वक खोती परंपराओं की डोर थामे रखता है। इसे कतई छोड़ना नहीं चाहता। और आगे,
और जिन्दगी का यह दरख़्त
वह पीपल भी है
बरगद
और अश्वत्थ भी।
सामाजिक विखंडन के दंश से व्यथित हुआ समाज, देश एक अनवरत चुप्पी में तबदील होचुका है तो कवि अंजीर का पेड़ के बहाने देश में आतंकवाद की पैदाइश की उत्तरदायी हवाओं, परिस्थितियों की पूर्वपीठिका बखान रहा है। यह नितांत नया विषय है जिस पर बहुत कम लिखा-कहा गया है। इसके प्रभाव-दुष्प्रभाव में केवल एक गरीब आदमी ही आता है, उसे ही इसे भुगतना है  और उसे ही इससे निबटना भी है,
दिलमें दुख सा
सपने के सुख सा
पेट में भूख सा
उगता है अंजीर का पेड़
इसके साथ ही कवि ने आतंकवाद, तालीबान व इस्लाम से संबंधित आधा दर्जन और भी कविताएँ संग्रह में संचयित की हैं। एक विराट जनसमुद्र को मात्र जीभ दिखाकर चिढ़ाना आतंक का मकसद तो नहीं, उसका असल गोपनीय व बदरूप चेहरा तो तब सामने आता हैजब वह मनुजादों की तरह अजीबोगरीब पशोपेश में डाल देने वाली तरकीबें रचता है और पूरा विश्व समाज आत्‍​र्तनाद करता रह जाता है और लोकतंत्र व पूंजीवाद का संरक्षक व ठेकेदार लाखों बेगुनाह लोगों को इसकी आधारहीन सजा भी देता है। यही सब समानान्तर काण्ड श्रीनिवास अपनी कविता में रेखांकित करते हैं,
और उधरशैतान के उड़न सर्प
काबिज हो गए थे उस पर
उन्होंने बना ली थी भूमिगत
अपनी एक दुनिया
बम और बन्दूकों से भरी
और फतवा यह
कि वे करेंगे दुनिया की अदालत में
अपने ईमान का दावा
धर्म के पतन का भी एक निश्चित क्रम है। कई-कई यातनाओं, वर्चस्व की हिंसाओं, नागयज्ञों, षड्यंत्रों से होकर गुजर रहा आज का समाज अपनी नियति को संहार से पहले ही सुरक्षित कर लेना चाहता है। जीवन में शांति रूपी आत्मिक धरोहर शेष रहे, इसलिए कवि विचित्र शब्दजाल बुनता है, एक भरा-पूरा दर्शन। धार्मिक विश्वासों को कचोटते बिम्ब प्रस्तुत करना श्रीनिवास के कवि की विशेषता है।
बहुत कुछ है जिसे हम कहने में
अब हुए हैं असमर्थ
असमर्थ है समय की
दो विपरीत दिशाओं की उन्मुख
चट्टानों को जोड़ना
काल की दरारों से समय का हिसाब मांगना
और पिपासु मद्यपों से
करना कहा-सुनी।
यथार्थ और स्वप्न के बीच के विभाजन को पाटने का दुष्प्राय कार्य करती श्रीनिवास की कविता निहायत ही सीधी हैं। पर आत्मा से वे इतनी दुष्कर हैं कि उनके निहितार्थ समझनासरल-सहज पाठक के बूते की बात कभी नहीं हो सकती। उनके द्वारा रचित काव्य युक्तियाँ हम जैसे काव्य पाठकों के लिए एक अवसर है, अपने छूटते समाज से पुन: संबद्ध होने का। अपना भोगा हुआ समय उनकी कविताओं में दर्शन बनकर बिम्बों के सहारे प्रकट होता है। श्रीनिवास की कविताओं से गुजरना एक ऐसे चक्रव्यूह से गुजरने काअनुभव है, जिसमें साहित्य-अपढ़ व्यक्ति कतई नहीं घुस सकता। यहाँ उनके लिए प्रवेश निषेध है, जो पाठ्यक्रमों के तुक्कड़ कवियों को पढ़ने भर के शौक़ीन हैं। श्रीनिवास जी ने कविता के माध्यम से समाज में जो दैनंदिन व्यवहारों के प्रश्न उठाकर सकारात्मक माहौल रचने का बीड़ा उठाया है, उसका हमें आदर करना चाहिए औरइस प्रयास में भागीदार होना श्रेष्ठ है, दूर खड़े होकर तालियाँ पीटने के। कि अब हमें खुद ही प्रमथ्यु होना है, मसीहा होना है, मूसा, नबी होना है, क्योंकि
कितना सम्मोहन है जीवन में
घरौंदे टूटने के बाद भी
एक सपना कौंध रहा कहीं दूर
 
– राजेशकिरण